रावरे पठाए जोग देन कौं सिधाए हुते ज्ञान गुन गौरव के अति उदगार में ।

लकुटिः भृकुटिः सुकटिः नटति नटनं कुरुते नटराज यदा।
नटकं नटनी निकटे नयति नयने नयनं विदधाति मुदा।।
हे नटराज जिस समय आप नृत्य करते हो तब आपकी,लकुटिया,भौह,और सुन्दर कमर भी नाचने लगती है।अपने इशारे पर अपने पास आकर्षण करने वाली आप की सहचरी आप को,,नटः,,को अपने पास ले जाती है प्रसन्नता मे आप के नेत्र मे अपना नेत्र स्थापिति कर देती है। रावरे पठाए जोग देन कौं सिधाए हुते ज्ञान गुन गौरव के अति उदगार में । कहै रतनाकर पै चातुरी हमारी सबै कित धौं हिरानी दसा दारुन अपार में ॥ उड़ि उधिरानी किधौं ऊरध उसासनि में बहि धौं बिलानी कहूँ आँसुनि की धार में । चूर ह्वै गई धौं भूरि दुख के दरेरनि में छार ह्वै गई धौं बिरहानल की झार में ॥ जोग को रमावै और समाधि को जगावै इहाँ दुख-सुख साधनि सौं निपट निबेरी हैं । कहै रतनाकर न जानैं क्यों इतै धौं आइ सांसनि की सासना की बासना बखेरी हैं ॥ हम जमराज की धरावतिं जमा न कछू सुर-पति-संपति की चाहति न हेरी हैं । चेरी हैं न ऊधौ ! काहू ब्रह्म के बबा की हम सूधौ कहे देति एक कान्ह की कमेरी हैं ॥ ऊधौ यहै सूधौ सौ संदेश कहि दीजौ एक जानति अनेक न विवेक ब्रज-बारी हैं । कहै रतनाकर असीम रावरी तौ क्षमा क्षमता कहाँ लौं अपराध की हमारी हैं ॥ दीजै और ताडन सबै जो मन भावै पर कीजै न दरस-रस बंचित बिचारी हैं । भली हैं बुरी हैं और सलज्ज निरलज्ज हू हैं को कहै सौ हैं पै परिचारिका तिहारी हैं ॥

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