वर्ष २०२३ में उत्तरायण आरम्भ की तिथि एवं मुहूर्त :- १४ जनवरी २०२३ को संक्रांति पल :- २० :२१ :४५ उत्तरायण काल जिसका मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है, वह दिवस है क्या / आरम्भ समय / धरा पर ऋतुओं का परिवर्तन :- शास्त्रों में वर्ष छह माह माघ अर्थात जनवरी से आषाढ़ अर्थात जून तक का समय उत्तरायण काल कहलाता है उत्तरायण का शाब्दिक अर्थ है उत्तर की ओर गमन जिसका आरम्भ सं २०२३ में १४ जनवरी को हो रहा है जिसको सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है मान्यता है कि उत्तरायण काल के दौरान किए गए कार्य शुभ फल देने वाले होते हैं क्योंकि सम्पूर्ण चराचर को अपने सकारत्मकता से परिपूर्ण रश्मियों से आलौकित करने वाले प्रत्यक्ष देवों में सर्वोपरि श्रीमन सूर्यनारायण इस समय समस्त देवताओं का अधिपति होते हैं जिसके कारण इनकी रश्मियां व्यक्ति के स्वास्त्य एवं शांति को बढ़ाती हैं। इस कालखंड में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं इसलिए इसे मकर संक्रांति भी कहा जाता है, जो कि हिंदू धर्म में एक बड़ा पर्व है। उत्तरायण के बाद ऋतु और मौसम में परिवर्तन होने लगता है। इसके फलस्वरूप शरद ऋतु यानि ठंड का मौसम धीर...
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रावरे पठाए जोग देन कौं सिधाए हुते ज्ञान गुन गौरव के अति उदगार में ।
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लकुटिः भृकुटिः सुकटिः नटति नटनं कुरुते नटराज यदा। नटकं नटनी निकटे नयति नयने नयनं विदधाति मुदा।। हे नटराज जिस समय आप नृत्य करते हो तब आपकी,लकुटिया,भौह,और सुन्दर कमर भी नाचने लगती है।अपने इशारे पर अपने पास आकर्षण करने वाली आप की सहचरी आप को,,नटः,,को अपने पास ले जाती है प्रसन्नता मे आप के नेत्र मे अपना नेत्र स्थापिति कर देती है। रावरे पठाए जोग देन कौं सिधाए हुते ज्ञान गुन गौरव के अति उदगार में । कहै रतनाकर पै चातुरी हमारी सबै कित धौं हिरानी दसा दारुन अपार में ॥ उड़ि उधिरानी किधौं ऊरध उसासनि में बहि धौं बिलानी कहूँ आँसुनि की धार में । चूर ह्वै गई धौं भूरि दुख के दरेरनि में छार ह्वै गई धौं बिरहानल की झार में ॥ जोग को रमावै और समाधि को जगावै इहाँ दुख-सुख साधनि सौं निपट निबेरी हैं । कहै रतनाकर न जानैं क्यों इतै धौं आइ सांसनि की सासना की बासना बखेरी हैं ॥ हम जमराज की धरावतिं जमा न कछू सुर-पति-संपति की चाहति न हेरी हैं । चेरी हैं न ऊधौ ! काहू ब्रह्म के बबा की हम सूधौ कहे देति एक कान्ह की कमेरी हैं ॥ ऊधौ यहै सूधौ सौ संदेश कहि दीजौ एक जानति अनेक न विवेक ब्रज-बारी हैं । कहै रतनाक...
प्रत्येक वर्ष में छह ऋतुएँ, प्रत्येक ऋतु में दो-दो माह की एवं दो-दो राशियां - सूर्य सिद्धान्त संक्रांति के अनुसार आश्चर्य किन्तु सत्य
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ज्योतिष में सूर्य सिद्धान्त संक्रांति के अनुसार वर्ष में छह ऋतुएँ होती हैं जिसमें प्रत्येक ऋतु दो-दो माह की एवं प्रत्येक में दो-दो राशियां बताई गई है- उत्तरायण के साथ शिशिर ऋतु प्रारंभ होती है जिसमें तीन ऋतुएँ हैं - १. शिशिर ऋतु - माघ एवं फाल्गुन मास अर्थात 21 दिसम्बर से 17 फरवरी एवं दो राशियां मकर और कुम्भ २. वसंत ऋतु -चैत्र और वैशाख मास अर्थात 18 फरवरी से 16 अप्रैल एवं दो राशियां मीन और मेष ३. ग्रीष्म ऋतु - ज्येष्ठ और आसाढ़ मास अर्थात 17 अप्रैल से 19 जून एवं दो राशियां वृष और मिथुन दक्षिणायन के साथ वर्षा ऋतु प्रारम्भ होती जिसमें भी तीन ऋतुओं का समावेश होता है और वे तीन ऋतुएँ हैं : १. वर्षा ऋतु - सावन औए भादों मास अर्थात 20 जून से 21 अगस्त एवं दो राशियां कर्क और सिंह २. शरद ऋतु - अश्विन और कार्तिक मास अर्थात 22 अगस्त से 21 अक्टूबर एवं दो राशियां कन्या और तुला ३. हेमंत - अगहन और पौष मास अर्थात 22 अक्टूबर से 20 दिसंबर एवं दो राशियां वृश्चिक और धनु सुश्रुत संहिता के अध्याय 6 के 10 वे श्लोक एवं चरक संहिता विमान के अध्याय 8 के 125 वे श्लोक के अनुसार वात, पित्त, कफ के सं...